
चौपाल न्यूज इन, रायपुर (छत्तीसगढ़) विशेष रिपोर्ट
रायपुर। सुबह की पहली किरण के साथ ही गांव-गांव, गली-गली और आंगनों में भक्ति का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। आज देशभर में माताओं ने अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए हल षष्ठी व्रत किया। आस्था से ओत-प्रोत इस पर्व को लेकर माताओं के चेहरों पर विशेष तेज और आंखों में संकल्प की चमक थी।
कल शाम से बाजारों में रौनक
हल षष्ठी व्रत की तैयारियों को लेकर राजधानी रायपुर, बिरगांव, उरकुरा, धरसीवा समेत ग्रामीण अंचलों के बाजारों में कल शाम से ही रौनक देखने को मिली। पूजा सामग्री, फल, दूध-दही, मौसमी फल और पारंपरिक पकवानों के लिए महिलाओं की खरीददारी देर रात तक चलती रही। हल, बैलों की सजावट और कथा वाचन के लिए आवश्यक वस्तुएं भी बाजार में प्रमुखता से बिकती रहीं।
व्रत की धार्मिक परंपरा और पुराणिक महत्व
भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत ललई छठ या कमर छठ नाम से भी जाना जाता है। पुराणों में वर्णित मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ था, इसलिए हल (कृषि का प्रतीक) और बैलों की पूजा का विशेष महत्व है। गेहूं-धान का प्रयोग वर्जित होता है, इसके स्थान पर चना, जौ, मूंग और दूध-दही का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
रायपुर और आसपास के क्षेत्रों में उत्सव का नजारा
राजधानी रायपुर सहित उरकुरा, बिरगांव, धरसीवा और आसपास के गांवों में सुबह से ही तालाब, सरोवर और कुओं पर माताओं का जमावड़ा रहा। स्नान-ध्यान के बाद उन्होंने बलराम जी और कृषि उपकरणों की पूजा-अर्चना की। कई स्थानों पर सामूहिक कथा वाचन आयोजित हुए, जहां महिलाएं पारंपरिक गीतों और पूजा विधियों के साथ पूरे मनोयोग से व्रत का पालन करती दिखीं।
आस्था की झलकियां – चौपाल न्यूज का विशेष कवरेज
📌 बलराम जयंती के साथ कृषि उपकरणों और बैलों की पूजा।
📌 बच्चों के माथे पर आशीर्वाद भरा हाथ और आंखों में मातृत्व का स्नेह।
📌 ग्रामीण अंचलों में सामूहिक कथा वाचन और पारंपरिक गीतों की गूंज।
📌 महिलाएं सजी-धजी पारंपरिक पोशाक में, हाथों में पूजा की थाली लिए उमंग से भरीं।
भावनात्मक समापन
यह व्रत सिर्फ धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मातृत्व की अटूट शक्ति और अपने बच्चों के लिए किए गए निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है। आज की भक्ति, आने वाले कल के सुखद भविष्य की नींव है—और यही आस्था पीढ़ियों से हमारे समाज की सबसे मजबूत डोर बनी हुई है।